वैष्णव जन तो तेने कहिये

संत नरसिंह मेहता
विष्णु भगवान भजन भजन नरसिंह मेहता
॥ दोहा ॥

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे।
पर-दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे॥

॥ चौपाई ॥

सकल लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे।
वाच काछ मन निश्चल राखे, धन-धन जननी तेनी रे॥
वैष्णव जन तो तेने कहिये...

सम-दृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर-स्त्री जेने मात रे।
जिह्वा थकी असत्य न बोले, पर-धन नव झाले हाथ रे॥
वैष्णव जन तो तेने कहिये...

मोह-माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे।
राम-नाम शुं ताली रे लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे॥
वैष्णव जन तो तेने कहिये...

वण-लोभी ने कपट-रहित छे, काम-क्रोध निवार्या रे।
भणे नरसैयो तेनुं दर्शन करतां, कुल एकोतेर तार्या रे॥
वैष्णव जन तो तेने कहिये...

॥ दोहा ॥

सच्चा वैष्णव वही है जो दूसरों की पीड़ा को अपनी समझकर दूर करे और मन में रंचमात्र भी अभिमान न लाए।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

15वीं सदी के गुजराती संत नरसिंह मेहता द्वारा रचित यह भजन सच्चे भक्त के लक्षण बताता है: परोपकार, सत्य, समदृष्टि और अहंकारहीनता।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।