॥ दोहा ॥
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई॥
॥ चौपाई ॥
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई।
छांड़ि दई कुल की कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई।
अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई॥
दधि मथि घृत काढ़ि लियो डारि दई छोई।
भगत देखि राजी हुई जगत देखि रोई॥
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोई।
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
॥ दोहा ॥
मीरा के प्रभु सदा सहाई, राखे नेह सगाई।
चरण कँवल की दासी मीरा, प्रभु चरनन चित लाई॥