नर तन फेर ना मिलेगो रे

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

नर तन फेर ना मिलेगो रे, बांधे क्यों गठड़िया प्राणी पाप की,

बड़े भाग मानुष तन पायो भटक भटक चौरासी,

अब के दाव चूक जाए बंदे फेर पड़े गल फांसी,

डंडा पीठ पे पड़ेगा ये , बांधे क्यों गठड़िया...

दिन ऊगे से दिन डूबे तक बेहद करें कमाई,

छोरा छोरी की लालच में महल दिये बनवाई,

इनमें कैसे तो रहेगो रे , बांधे क्यों गठड़िया.......

माया के मद में आकर के,रोज मचावे दंगा,

एक दिन मरघट बीच ले जाएंगे कुटुम्ब करें तोय नंगा,

वा दिन चौड़े में फुकेगो रे ,बांधे क्यों गठड़िया......

देहरी तक तेरी तिरिया रोवे पोरी तक तेरी मैया,

तेरह दिन तक याद रहेगी कहे कबीर समझैया,

नाता यही तक रहेगो रे, बांधे क्यों गठड़िया........

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।