भाव का भूखा हूँ मैं बस भाव ही एक सार है

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॥ पावन पाठ ॥

भाव का भूखा हूँ मैं, बस भाव ही एक सार है |

भाव से मुझ को भजे तो, उसका बेडा पार है ||

अन्न धन अरु वस्त्र भूषण, कुछ न मुझको चाहिए |

आप हो जाये मेरा बस, पूरण यह सत्कार है ||

भाव बिन सुना पुकारे, मैं कभी सुनता नहीं |

भाव की एक टेर ही, करती मुझे लाचार है ||

भाव बिन सब कुछ भी दे तो, मै कभी लेता नहीं |

भाव से एक फुल भी दे, तो मुझे स्वीकार है ||

जो भी मुझ मे भाव रख कर, आते है मेरी शरण |

मेरे और उस के ह्रदय का, एक रहता तार है ||

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।