॥ पावन पाठ ॥
हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री ।
कैं कहुं काज किया संतन का ।
कैं कहुं गैल भुलावना ॥
कहा करूं कित जाऊं मेरी सजनी ।
लाग्यो है बिरह सतावना ॥
मीरा दासी दरसण प्यासी ।
हरि-चरणां चित लावना ॥
हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री ।
कैं कहुं काज किया संतन का ।
कैं कहुं गैल भुलावना ॥
कहा करूं कित जाऊं मेरी सजनी ।
लाग्यो है बिरह सतावना ॥
मीरा दासी दरसण प्यासी ।
हरि-चरणां चित लावना ॥