नगर खेड़े की खैर

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

नगर खेड़े दी खैर वे साइयां नगर खेड़े दी खैर,

मुक जान सबदे वैर वे साइयां मुक जान सबदे वैर,

नगर भी तेरा ते खेत भी तेरे,

तू पा जा फकीरा कदे पैर,

नगर खेड़े दी खैर….

आण्ड गवांड मेरे चाचे ताये, बसण वीर परजाइयाँ,

सौरे घर विच इज्जत मानन सब दिया मां दिया जाइयाँ,

मेरी बीबी मां दिया जाइयाँ, इक्को घर विच मत्था टेकन की अपने की गैर,

नगर खेड़े दी खैर….

सबदे घर विच रोटी होवे, हक़ शक दा होवे चूल्हा,

जो भी आवे छकके तुरजे दर दरवाजा खुला,

हिन्दू सिख की मुल्ला, मेरा हिन्दू सिख की मुल्ला,

रल मिल छकिये ते खण्ड बन जावे कल्लयाँ बन जे जहर,

नगर खेड़े दी खैर….

सचियों पौण गुरु बन जावे, धरती बन जे मां,

धुपे बाबा कीरत करे ते, अम्बर करदे छां अम्बर करदे छां,

राती चन नाल गल्लां करिये, तत्ता मेरे नाल शह,

नगर खेड़े दी खैर….

भजन - नीरज शर्मा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।