तूने रात गँवायी सोय के

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

तूने रात गँवायी सोय के,

दिवस गँवाया खाय के।

हीरा जनम अमोल था,

कौड़ी बदले जाय॥

तूने रात गँवायी सोय के

सुमिरन लगन लगाय के,

मुख से कछु ना बोल रे।

बाहर का पट बंद कर ले,

अंतर का पट खोल रे।

माला फेरत जुग हुआ,

गया ना मन का फेर रे।

गया ना मन का फेर रे।

हाथ का मनका छाँड़ि (छोड़) दे,

मन का मनका फेर॥

तूने रात गँवायी सोय के,

दिवस गँवाया खाय के।

हीरा जनम अमोल था,

कौड़ी बदले जाय॥

तूने रात गँवायी सोय के

दुख में सुमिरन सब करें,

सुख में करे न कोय रे।

जो सुख में सुमिरन करे,

तो दुख काहे को होय रे।

सुख में सुमिरन ना किया,

दुख में करता याद रे।

दुख में करता याद रे।

कहे कबीर उस दास की

कौन सुने फ़रियाद॥

तूने रात गँवायी सोय के,

दिवस गँवाया खाय के।

हीरा जनम अमोल था,

कौड़ी बदले जाय॥

तूने रात गँवायी सोय के

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।