भरत भाई, कपि से उरिन हम नाहीं

संत तुलसीदास
श्री राम भजन राम भजन ram
॥ पावन पाठ ॥

भरत भाई, कपि से उरिन हम नाहीं

कपि से उरिन हम नाहीं

भरत भाई, कपि से उरिन हम नाहीं

सौ योजन, मर्याद समुद्र की

ये कूदी गयो छन माहीं।

लंका जारी, सिया सुधि लायो

पर गर्व नहीं मन माहीं॥

कपि से उरिन हम नाहीं

भरत भाई, कपि से उरिन हम नाहीं

शक्तिबाण, लग्यो लछमन के

हाहा कार भयो दल माहीं।

धौलागिरी, कर धर ले आयो

भोर ना होने पाई॥

कपि से उरिन हम नाहीं

भरत भाई, कपि से उरिन हम नाहीं

अहिरावन की भुजा उखारी

पैठी गयो मठ माहीं।

जो भैया, हनुमत नहीं होते

मोहे, को लातो जग माहीं॥

कपि से उरिन हम नाहीं

भरत भाई, कपि से उरिन हम नाहीं

आज्ञा भंग, कबहुं नहिं कीन्हीं

जहाँ पठायु तहाँ जाई।

तुलसीदास, पवनसुत महिमा

प्रभु निज मुख करत बड़ाई॥

कपि से उरिन हम नाहीं

भरत भाई, कपि से उरिन हम नाहीं

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।