करम की गति न्यारी न्यारी संतो

मीरा बाई
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॥ पावन पाठ ॥

करम की गति न्यारी न्यारी, संतो।

बड़े बड़े नयन दिए मिरगन को,

बन बन फिरत उधारी॥

उज्वल वरन दीन्ही बगलन को,

कोयल लार दीन्ही कारी॥

औरन दीपन जल निर्मल किन्ही,

समुंदर कर दीन्ही खारी॥

मूर्ख को तुम राज दीयत हो,

पंडित फिरत भिखारी॥

मीरा के प्रभु गिरिधर नागुण

राजा जी को कौन बिचारी॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।