ए वेला तेरे हथ नई आउना

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

उठ कै देइ ए बरोड़ गुजरी ,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ,

खर्चेगी लाख-करोड़ गुजरी, ए वेला तेरे हथ नहीं आउना |

काहे दी मटकी, काहे दी मधानी,

काहे दी लाइ ए डोर गुजरी,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ।

तन दी मटकी, मन दी मधानी,

सूरत-शब्द की ये डोर गुजरी,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ।

सत्संग दा तू जाग लगाईं लै,

जे तैनू वाखन दी लोड़ गुजरी,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ।

एसा दिया जो तू देइ कर बरोड़ी,

माखन लेंगी बरोड़ गुजरी,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ।

नाम अमिरस चाखन चाहे,

मन विषया कोड़ो मोड़ गुजरी,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ।

कहत कबीर सुनो भाई साधो ,

गुर चरना चित जोड़ गुजरी,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ।

उठ कै देइ ए बरोड़ गुजरी,

ए वेला तेरे हथ नहीं आउना,

खर्चेगी लाख-करोड़ गुजरी, ए वेला तेरे हथ नहीं आउना ।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।