मैं मांगती तेरे दरबार दी

नरेन्द्र चंचल
माता दुर्गा गुरु वाणी दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

ना मैं सोहनी, ना गुण पल्ले, ना कोई सोहना अमल कमाया

घर देयां आवें भूल भुलेखे मेरा सोहनी नाम धराया

अज्ज दोहाई है सच्ची सरकार दी

मैं मंगती तेरे दरबार दी

किसे कम दी ना, किसे कार दी,

मैं मंगती तेरे दरबार दी

कोई गुण नहीं पल्ले, मैं अवगुण हारी

दुखा दी मारी माँ मैं दुखेयारी

मेनू दुनिया है दुत्कारदी

मैं मंगती तेरे दरबार दी...

मैं करमा मारी, मेनू चरनी ला ले

नी मेरा होर ना कोई मेनू अपना बना ले

तू ते सब दे भाग सवारदी

मैं मंगती तेरे दरबार दी...

जन्मा तो प्यासी मेरी रूह कुर्लावे

मेरे चंचल मन नु माँ चैन न आवे

मेनू तलब तेरे दीदार दी

मैं मंगती तेरे दरबार दी...

हे जग दी दाती, मेरा मान न तोड़ी

इस चंचल नु माँ, खाली ना मोड़ी

तैनू सोह बचेया दे प्यार दी,

मैं मंगती तेरे दरबार दी...

इस दी माया समझ ना औदी है

अपनी लीला अजब दिखांदी है

सारी दुनिया दी हुकामराह हो के

अपने बचेया तो हार जांदी है

श्रधा दे नाल मना लिता

दस तू जीतिओ के मैं जितेया

जो मंगेया सी ओह पा लिता

मैं मंगती तेरे दरबार दी...

मैया तू सब तो आली है

तू सारे जग दी वाली है

मैं वि ते चाकर दर दा हां

दिन रात ही सेवा करदा हां

सेवा नाल तैनू पा लिता

दस तू जीतिओ के मैं जितेया...

तू पुचेया ते मैं चुप रहा

ना अपने दिल दा हाल कहा

दिल बोलेया तू पहचान गयी

सब दिल दीया गलां जान गयी

बिन मंगेया सब कुछ पा लिता

दस तू जीतिओ के मैं जितेया...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।