आया बुलावा भवन से मैं रह नहीं पाई

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

आया बुलावा भवन से, मैं रह नहीं पाई |

अपने पति संग चढ़ के चडाई नंगे पाँव आई |

लाल चुनरी चढाऊं, तेरी ज्योति जगाऊं,

बस इतना वर चाहूँ , मैं बस इतना वर पाऊं,

दर्शन को हर साल सदा सुहागन ही आऊँ ||

हे अखंड ज्योतों वाली माता, मेरा भी अखंड सुहाग रहे |

सदा खनके चूड़ियाँ मेरे हाथों में, सिंदूर बरी मेरी मांग रहे |

महके परिवार, रहे खिली बहार, कलियों की तरह मुकाऊं ||

अपने भगतो पर करती हो उपकार सदा |

ममता के खोले रहती हो भण्डार सदा ||

मैं तो आई तेरे द्वार, मेरे भाग्य सवार |

तेरी नित नित ज्योति जगाऊं ||

मुझ को वर दो मेरा स्वामी तेरी भक्ति में मगन रहे |

जब तक यह जीवन रहे सरल लक्खा को तेरी लगन रहे |

तेरा सच्चा दरबार, तेरी महिमा अपार,

चरणों में शीश निवाऊं |

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।