मन ना रंगाए जोगी कपड़ा रंगाए

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

तन को जोगी सब करे, मन को करे ना कोई,

सहजे सब सिद्धि पाइए, जो मन जोगी होय ।

हम तो जोगी मन ही के, तन के हैं ते और,

मन को जोग लगावता, दशा भई कछु और ॥

मन ना रंगाए जोगी,कपड़ा रंगाए,

मन ना फिराए जोगी,मनका फिराए,

मन ना रंगाए जोगी,कपड़ा रंगाए |

आसन मार गुफा में बैठे,मनवा चहुँ दिस ध्याये,

भव तारट घट बीच बिराजे,

खोजें तीरथ जाए,

मन ना रंगाए जोगी,कपड़ा रंगाए |

पोथी बांचे,याद करावे,

भगति कहूं नहीं पाये,

मनका मनका फेरे नाही,

तुलसी माल फिराए फिराए,

मन ना रंगाए जोगी,कपड़ा रंगाए |

जोगी होके जागा नाही,

चौरासी भरमाये,

जोग-जुगत सो दास कबीरा,

अलख निरंजन पाये,

मन ना रंगाए जोगी,कपड़ा रंगाए |

मन ना रंगाए जोगी,कपड़ा रंगाए,

मन ना फिराए जोगी,मनका फिराए,

मन ना रंगाए जोगी,कपड़ा रंगाए |

रचयिता - कबीर दास

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।