हमारे गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

हमारे गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी,

पाई अमर निशानी ।

गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी

हमारे गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी

काग पलट गुरु हंसा किन्हे,

दीन्हि नाम निशानी ।

हंसा पहुंचे सुख-सागर पर,

मुक्ति भरे जहाँ पानी ॥

गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी,

हमारे गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी ॥

जल विच कुम्भ,कुम्भ विच जल है,

बाहर भीतर पानी ।

विकस्यो कुम्भ जल जल ही समाना,

यह गति विरले ने जानी ॥

गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी,

हमारे गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी ॥

है अथाह थाह संतन में,

दरिया लहर समानी ।

धीवर डाल जाल का करिहै,

जब नीम पिघल भए पानी ॥

गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी,

हमारे गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी ॥

अन्धो का ज्ञान, उजल तकि वाणी ,

सोहे अकछ कहानी ।

कहे कबीर गूंगे की सेना,जिन जानी उन मानी ॥

गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी,

हमारे गुरु मिले ब्रम्हज्ञानी ॥

रचयिता - कबीर दास

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।