मेरी सुरति सुहागन जाग री

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

मेरी सुरति सुहागन जाग री,

जाग री...हो जाग री....

जाग री...हो जाग री....

मेरी सुरति सुहागन जाग री,

क्या तू सोवे मोहिनी नींद में,

उठ के भजन विच लाग री,

जाग री...हां जाग री...

मेरी सुरति सुहागन जाग री |

अनहद शब्द सुनो चित देके,

उठत मधुर धुन राग री,

जाग री...हां जाग री...

मेरी सुरति सुहागन जाग री |

चरण शीश धार विनती करियो,

पाएगी अटल सुहाग री,

जाग री...हां जाग री...

मेरी सुरति सुहागन जाग री,

कहत कबीरा सुनो भाई साधो,

जगत-प्रीत दे भाग री,

जाग री...हां जाग री...

मेरी सुरति सुहागन जाग री,

रचयिता - कबीर दास

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।