आवे ना जावे मरे नहीं जन्मे

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

दर दिवार दर्पण भयो,

जित देखू तित तोय ।

कंकर पत्थर ठीकरी,

सब भयो आरसी मोय ॥

आवे ना जावे, मरे नहीं जन्मे,

सोई निज पीव हमारा हो ।

ना प्रथम जननी ने जनमो,

ना कोई सिर जन हारा हो ॥

आवे ना जावे, मरे नहीं जन्मे

सोई निज पीव हमारा हो...

साधनसिद्ध मुनि ना तपसी,

ना कोई करत आचारा हो ।

ना खट दर्शन चार बरन में,

ना आश्रम व्यवहारा हो ॥

आवे ना जावे, मरे नहीं जन्मे

सोई निज पीव हमारा हो...

ना त्रिदेवा सो हम शक्ति,

निराकार से पारा हो ।

शब्द अतीत अचल अविनाशी,

छर अक्षर से न्यारा हो ॥

आवे ना जावे, मरे नहीं जन्मे

सोई निज पीव हमारा हो...

ज्योति स्वरुप निरंजन नाही,

ना ओम हुंकारा हो ।

धरनी ना गगन,पवन ना पानी,

ना रवि चंदा तारा हो ॥

आवे ना जावे, मरे नहीं जन्मे

सोई निज पीव हमारा हो...

है प्रगट पर दिसत नाही,

सतगुर सैन सहारा हो ।

कहे कबीर सब घट में ही साहिब,

परखो परखन हारा हो ॥

आवे ना जावे, मरे नहीं जन्मे

सोई निज पीव हमारा हो...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।