॥ दोहा ॥
द्वार खड़े प्रभु देखिये, इक विप्र अति दीन।
शीश पगा न झगा तन में, दुर्बल देह मलीन॥
॥ चौपाई ॥
अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो, कि दर पे सुदामा गरीब आ गया है।
भटकते भटकते न जाने कहाँ से, तुम्हारे महल के करीब आ गया है॥
न सर पे है पगड़ी न तन पे है जामा, बता दो कन्हैया को नाम है सुदामा।
इक बार मोहन से जा कर के कह दो, मिलने सखा बदनसीब आ गया है॥
सुनते ही दौड़े चले आये मोहन, लगाया गले से सुदामा को मोहन।
हुआ रुक्मिणी को बहुत ही अचम्भा, ये कैसा अनोखा नसीब आ गया है॥
अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो, कि दर पे सुदामा गरीब आ गया है॥
॥ दोहा ॥
आंसू से धोए चरण प्रभु, दियो परम सम्मान।
भक्त वत्सल भगवान का, गावत वेद पुरान॥