गुरु जम्भेश्वर

पारंपरिक
श्री कृष्ण संत साहित्य Bhakt Guru Jambheshwar Bhakt
॥ पावन पाठ ॥

भक्तिमालः जम्भेश्वर | गुरु जम्भेश्वर

वास्तविक नाम - जम्भेश्वर

अन्य नाम - गुरु जम्भेश्वर जी महाराज

आराध्य - भगवान विष्णु

जन्म - 1451

जन्म स्थान - पिपासर, राजस्थान

मृत्यु - 1536 (मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी)

वैवाहिक स्थिति: अविवाहित

पिता - ठाकुर श्री लोहत जी पंवार

माता - हंसा देवी

भाषा - हिंदी, अंग्रेजी

प्रख्यात - आध्यात्मिक संत

संस्थापक - बिश्नोई पंथ

मंत्र: "विष्णु विष्णु तु भां रे प्राणि"

मंदिर: मुकाम, समरथल, पीपसार, जांभोलव, लालासर सथरी और जाजीवाल

गुरु जम्भेश्वर मध्यकालीन भारत के एक महान संत और दार्शनिक थे। उन्होंने हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों और औपचारिकताओं के खिलाफ आवाज उठाई। एक संपन्न राजपूत परिवार में जन्मे। 34 वर्ष की आयु में, गुरु जम्भेश्वर ने समरथल धोरा में वैष्णववाद के बिश्नोई उप-संप्रदाय की स्थापना की। उनकी शिक्षाएं काव्यात्मक रूप में थीं जिन्हें शबदवाणी के नाम से जाना जाता है। गुरु जम्भेश्वर जी महाराज 15वीं शताब्दी के एक संत और महान पर्यावरणविद थे। 15वीं शताब्दी के सभी संतों में गुरु जम्भेश्वर जी अद्वितीय थे।

बिश्नोई पंथ 29 नियमों के इर्द-गिर्द घूमता है। इनमें से आठ जैव विविधता के संरक्षण और अच्छे पशुपालन को प्रोत्साहित करने के लिए निर्धारित हैं, सात स्वस्थ सामाजिक व्यवहार के लिए निर्देश प्रदान करते हैं, और दस व्यक्तिगत स्वच्छता और बुनियादी अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए निर्देशित हैं। अन्य चार आज्ञाएँ प्रतिदिन विष्णु की पूजा करने के लिए दिशानिर्देश प्रदान करती हैं।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

गुरु जम्भेश्वर | Guru Jambheshwar

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।