अभिनवगुप्त

पारंपरिक
श्री कृष्ण संत साहित्य Bhakt Jaya Kishori Ji Bhakt
॥ पावन पाठ ॥

भक्तमाल | गुरु अभिनवगुप्त

वास्तविक नाम - शंकर

अन्य नाम - महामहेश्वर, आचार्य अभिनवगुप्त, गुरुनाथ

आराध्य - भगवान शिव

जन्म - 950-960 ई.

जन्म स्थान - कश्मीर

मृत्यु - 1016 ई. मंगम, कश्मीर

वैवाहिक स्थिति - अविवाहित

भाषा - कश्मीरी

पिता - नरसिंहगुप्त

माता - विमला

प्रसिद्धि - तंत्रालोक, कश्मीर शैव धर्म

अभिनवगुप्त भारत के महानतम दार्शनिकों, रहस्यवादियों, कवियों, संगीतकारों और सौंदर्यशास्त्रियों में से एक थे। वे लगभग 10वीं-11वीं शताब्दी ई. में कश्मीर में रहे और कश्मीर शैव धर्म के सबसे प्रभावशाली गुरु बने।

अभिनवगुप्त क्यों प्रसिद्ध हैं

❀ कश्मीर शैव धर्म के अद्वैत दर्शन की व्याख्या।

❀ तंत्र और आध्यात्मिकता पर गहन टीकाएँ लिखना।

भारत के सौंदर्यशास्त्र और "रस" (कला में भावनात्मक अनुभव) के शास्त्रीय सिद्धांत का विकास करना।

❀ उनका सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक ग्रंथ तंत्र, ध्यान, योग, मंत्र और मुक्ति के मार्ग की गहन व्याख्या करता है।

❀ भरत मुनि द्वारा रचित नाट्य शास्त्र पर उनकी प्रसिद्ध टीका। उन्होंने रस के प्रसिद्ध सिद्धांत की व्याख्या की - जो नाटक, नृत्य, संगीत और कविता में अनुभव किया जाने वाला भावनात्मक सार है।

❀ उन्होंने आध्यात्मिकता, सौंदर्यशास्त्र, व्याकरण, कविता, संगीत और रंगमंच सहित ज्ञान की कई शाखाओं में महारत हासिल की।

❀ उनकी शिक्षाओं में भक्ति, ध्यान, दर्शन और कलात्मक अभिव्यक्ति का संगम था।

अभिनवगुप्त की शिक्षा

❀ संपूर्ण ब्रह्मांड दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति है।

❀ प्रत्येक आत्मा मूल रूप से शिव के समान है।

❀ आत्म-पहचान, ध्यान, भक्ति और आंतरिक जागरूकता से आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होती है।

❀ कला के माध्यम से आध्यात्मिक आनंद की उत्पत्ति को समझाकर उन्होंने भारतीय कला सिद्धांत में क्रांतिकारी परिवर्तन किया।

अभिनवगुप्त के अनुसार, महान कविता, संगीत और नाटक चेतना को उन्नत करते हैं। रस का अनुभव लोगों को सामान्य भावनाओं से परे एक सार्वभौमिक आनंद का अनुभव कराता है।

अभिनवगुप्त भारतीय दर्शन के विद्वानों, तंत्र और योग के अभ्यासकर्ताओं, शास्त्रीय नृत्य, संगीत और रंगमंच के छात्रों और कश्मीर शैव धर्म के अनुयायियों के बीच अत्यंत सम्मानित हैं। कई आधुनिक शोधकर्ता उन्हें भारतीय इतिहास के महानतम बुद्धिजीवियों में से एक मानते हैं।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

अभिनवगुप्त | Abhinavagupta

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।