हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय

पारंपरिक
श्री कृष्ण आरती कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।

दरद की मारी बन बन डोलूं बैद मिल्यो नही कोई॥

ना मैं जानू आरती वन्दन, ना पूजा की रीत।

लिए री मैंने दो नैनो के दीपक लिए संजोये॥

घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।

जौहरि की गति जौहरी जाणै की जिन जौहर होय॥

सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस बिध होय।

गगन मंडल पर सेज पिया की, मिलणा किस बिध होय॥

दरद की मारी बन-बन डोलूं बैद मिल्या नहिं कोय।

मीरा की प्रभु पीर मिटेगी जद बैद सांवरिया होय॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।