त्वमेव माता च पिता त्वमेव (प्रपत्ति श्लोक)

पांडव गीता / प्रपत्ति स्तोत्र
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॥ दोहा ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव॥
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

॥ चौपाई ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव॥
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

सरल भावार्थ:
हे प्रभु! तुम्हीं मेरी माता हो और तुम्हीं मेरे पिता हो। तुम्हीं मेरे बंधु-बांधव हो और तुम्हीं मेरे परम सखा हो। तुम्हीं मेरी विद्या हो और तुम्हीं मेरी समस्त संपत्ति (धन) हो। हे देवों के देव महादेव! मेरे तो सब कुछ केवल तुम्हीं हो।

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि॥
(शरीर, वाणी, मन, इंद्रियों, बुद्धि और स्वभाव से मैं जो कुछ भी कर्म करता हूँ, वह सब परम पुरुष भगवान नारायण को समर्पित करता हूँ।)

॥ दोहा ॥

ॐ श्रीमन नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये।
श्रीमते नारायणाय नमः॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

ईश्वर के प्रति आत्मीयता और पूर्ण शरणागति व्यक्त करने वाला यह श्लोक दैनिक पूजा और संध्या-वंदन का अभिन्न अंग है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।