जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीना के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनीचर देव, सब सुरन में प्रधान।
करहु कृपा हे सूर्यसुत, दीजै भक्ति दान॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
श्याम वरण तन तेज विराजे। गदा त्रिशूल हाथ में साजे॥
काक वाहन पर प्रभु बिराजे। देखि रूप सुर मुनि सब लाजे॥
सूर्य सुवन छाया के नंदन। दुष्ट दलन पापी मद भंजन॥
न्यायप्रिय प्रभु न्याय विधाता। कर्म अनुसार फल के दाता॥
राजा हरिश्चंद्र नृप भारी। शनि प्रभाव विपदा विस्तारी॥
तारा रानी अरु रोहिताशू। बिके हाट मणिकर्णिका आशु॥
रामचन्द्र को बन भिजवाया। रावण कुल समूल नशाया॥
शनि प्रकोप सब पर दरसाया। देव दनुज सब शीश झुकाया॥
जो जन शनि चालीसा गावै। तापर शनिदेव कृपा बरसावै॥
शनिवार को तेल चढ़ावै। तिल उड़द का भोग लगावै॥
लोहे की वस्तु दान करावे। सो नर भव संकट नहिं पावे॥
पाठ शनीचर देव को, कीन्हों विमल तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥