गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः (गुरु वंदना)

स्कंद पुराण (गुरु गीता)
अन्य श्लोक श्लोक गुरु
॥ दोहा ॥

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

॥ चौपाई ॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥१॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥२॥

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥३॥

सरल भावार्थ:
गुरु ही साक्षात ब्रह्मा (सृजनकर्ता), गुरु ही विष्णु (पालनकर्ता), और गुरु ही महेश्वर (शिव - संहारकर्ता) हैं। गुरु साक्षात परब्रह्म परमात्मा हैं, ऐसे श्री सद्गुरुदेव के श्रीचरणों में मेरा बारंबार नमन है।

॥ दोहा ॥

ध्यानमूलं गुरुर्मूर्तिः पूजामूलं गुरुर्पदम्।
मंत्रमूलं गुरुर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरुकृपा॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

गुरु गीता से उद्धृत यह वंदना गुरु के त्रिमूर्ति स्वरूप और उनके द्वारा अज्ञान का तिमिर हरकर मोक्ष मार्ग दिखाने की महिमा का गान करती है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।