यदा यदा हि धर्मस्य (श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक)

महर्षि वेदव्यास / भगवान श्री कृष्ण
श्री कृष्ण श्लोक श्लोक गीता
॥ दोहा ॥

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

॥ चौपाई ॥

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
(श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ४, श्लोक ७-८)

सरल भावार्थ:
हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होने लगता है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप में प्रकट होता हूँ।

साधु पुरुषों के उद्धार के लिए, पापकर्म करने वाले दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की भली-भाँति पुनः स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।

॥ दोहा ॥

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भगवान श्री कृष्ण द्वारा धर्म की रक्षा, संतों के परित्राण और अधर्म के नाश हेतु युग-युग में अवतार लेने का दिव्य आश्वासन।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।