कर्मण्येवाधिकारस्ते (श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक)

महर्षि वेदव्यास / भगवान श्री कृष्ण
श्री कृष्ण श्लोक श्लोक गीता
॥ दोहा ॥

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

॥ चौपाई ॥

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २, श्लोक ४७)

विस्तृत अन्वय एवं पद-परिच्छेद:
कर्मणि + एव + अधिकारः + ते (तेरा अधिकार केवल कर्म करने में ही है),
मा + फलेषु + कदाचन (फलों में कभी भी नहीं),
मा + कर्मफलहेतुः + भूः (तू कर्मों के फल का हेतु मत बन),
मा + ते + सङ्गः + अस्तु + अकर्मणि (और तेरी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी आसक्ति न हो)।

गहन आध्यात्मिक रहस्य:
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का उपदेश देते हुए समझाते हैं कि मनुष्य का नियंत्रण केवल अपने वर्तमान पुरुषार्थ और कर्तव्य-पालन पर है, उसके भविष्यगामी परिणाम पर नहीं। जब मनुष्य फल की चिंता छोड़कर पूर्ण समर्पण और कुशलता के साथ कर्म करता है, तो वह कर्मबंधन और मानसिक तनाव से सर्वथा मुक्त हो जाता है।

॥ दोहा ॥

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का यह महाश्लोक निष्काम कर्मयोग का आधार स्तंभ है, जो कर्म करने में समर्पण और फल की आसक्ति से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।