निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
उठु उठु चलु तोहि राम दोहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चपला चल कांता। ॐ हं हं हं हनुमंत अनंता॥
ॐ हं हनुमते नमः...
इन्हें मारु मारु तोहि सपथ राम की।
राखु लाज मर्यादा नाम की॥
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥