मातु लक्ष्मी करि कृपा, करहु हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननी सुखदाता। सब जग की तुम ही अन्नदाता॥
क्षीरसिन्धु में उपज तुम्हारी। विष्णु प्रिया सब सुख करनारी॥
महालक्ष्मी जय जय जगदम्बा। सबकी तुम ही मात अवलम्बा॥
रिद्धि सिद्धि सब तुम्हरी चेरी। दया दृष्टि करि हरहु विपद मेरी॥
कमल बास करुणामय माता। सुख सम्पति वैभव की दाता॥
जो जन तुम्हरी पूजा करई। दरिद्रता सो तुरंत बिसरई॥
घर में नित मंगल सुख छावै। लक्ष्मी चरण कमल जब आवै॥
दीपावली पर जो जन ध्यावै। दीप जलाय आरती गावै॥
ताके घर नहिं दारिद्र आवे। सुख संपत्ति नित नव फल पावे॥
त्राहि त्राहि दुख हरणि, सुख करणि जन मातु।
कृपा दृष्टि मोहि पर करहु, दीजै सुख वरदान॥