जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजित मणिकन कनक मुकुट मनि। कानन कुंडल छवि मन मोहनि॥
गले सुशोभित पुष्प मालिका। स्वर्ण यज्ञोपवीत शुचि का॥
चार भुजा धरि अस्त्र विराजत। एकदन्त मुख परम बिराजत॥
मोदक भोग सुगंधित पावैं। मूषक वाहन शीश नवावैं॥
रिद्धि सिद्धि संग करत विलासा। पूर्ण करहु दास की आसा॥
प्रथम पूज्य सुर मुनि सिर नावें। वेद पुराण जाहि जस गावें॥
संकट में जब जब जन ध्यावैं। विघ्न विनाशक तुरत सहावैं॥
मातु पिता की सेवा कीन्ही। परिक्रमा करि महिमा लीन्ही॥
सकल देव मिलि कीन्ह बड़ाई। प्रथम पूज्य की पदवी पाई॥
जो यह पाठ करै चित लाई। बुद्धि विद्या यश विपुल सवाई॥
अष्टसिद्धि नवनिधि सुख पावै। अंतकाल वैकुंठ सिधावै॥
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ताके काज सिद्ध सब होई॥
पुत्र पौत्र धन धान्य लहि, परम आनंद समाई॥