वृन्दावन सो वन नहीं नन्दगाँव सो गाँव

चित्र विचित्र जी महाराज
श्री कृष्ण भजन भजन चित्र विचित्र जी
॥ दोहा ॥

वृन्दावन सो वन नहीं, नन्दगाँव सो गाँव।
बंशीवट सो वट नहीं, कृष्ण नाम सो नाँव॥

॥ चौपाई ॥

वृन्दावन सो वन नहीं, नन्दगाँव सो गाँव।
बंशीवट सो वट नहीं, कृष्ण नाम सो नाँव॥

जहाँ बहती यमुना पावन, निर्मल अमृत धार।
कदम कदम पर गूंजता, राधा नाम पुकार॥
वृन्दावन सो वन नहीं॥

गोवर्धन सम गिरि नहीं, बरसाने सम धाम।
राधा जू सम ठकुरानी नहीं, नन्दलाल सम श्याम॥
वृन्दावन सो वन नहीं॥

चित्र विचित्र लोटत रहे, पावन ब्रज की रेणु।
अधरों पर अमृत भरे, मोहन बाजे वेणु॥
वृन्दावन सो वन नहीं, नन्दगाँव सो गाँव।
बंशीवट सो वट नहीं, कृष्ण नाम सो नाँव॥

॥ दोहा ॥

ब्रज मंडल महिमा अमित, गावे सुर मुनि ईश।
चित्र विचित्र बलिहारी जावे, चरण नवावे शीश॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

ब्रजभूमि, वृंदावन धाम, नंदगाँव, गोवर्धन और बरसाना की अलौकिक सर्वश्रेष्ठता का प्राचीन रस पद।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।