॥ दोहा ॥
वृंदावन के वृक्ष को मरम न जाने कोय।
जहाँ डाल डाल और पात पात पे राधे राधे होय॥
॥ चौपाई ॥
वृंदावन जाऊंगी सखी री, मेरी कुटिया वहीं बनाऊंगी।
बांके बिहारी के दर्शन पाऊंगी, सखी री कुटिया वहीं बनाऊंगी॥
यमुना जी में स्नान करूंगी, श्री राधा नाम जपूँगी।
परिक्रमा गोवर्धन की लाऊंगी, सखी री कुटिया वहीं बनाऊंगी॥
संतन के संग बैठ सत्संग में, हरि गुण निसिदिन गाऊंगी।
ब्रज की रज मस्तक पे लगा के, जीवन धन्य बनाऊंगी॥
वृंदावन जाऊंगी सखी री, मेरी कुटिया वहीं बनाऊंगी॥
॥ दोहा ॥
धन्य वृंदावन धाम है, धन्य जमुना का नीर।
धन्य श्री राधा लाडली, धन्य बाल बलबीर॥