विद्या प्रदायिनी भारती - ज्ञान प्रकाश उजासे आराधना

संत तुकाराम
माता सरस्वती भजन भजन माता सरस्वती
॥ दोहा ॥

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥

॥ चौपाई ॥

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।
विद्या बुद्धि प्रदान करो माँ, अज्ञान तिमिर सब हरता॥

मन भज ले तू पावन नाम, यही है सच्चा विश्राम।
संसार के सब रिश्ते झूठे, एक सहारा राम॥

श्वेत हंस पर बैठ विराजे, वीणा सुर झनकारे।
मूर्खहु पंडित बन जावे जब, दया दृष्टि विस्तारे॥
करुणा की अविरल सरिता माँ, शब्द ब्रह्म कल्याणी।
अंतर वीणा जागृत कीजे, वर दो हे कल्याणी॥

॥ दोहा ॥

तुका म्हणे विट्ठल नाम, तारी सकल भुवन।
प्रेम भावे कीर्तन करितां, पावे समाधान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

वारकरी संप्रदाय के संत तुकाराम जी का यह अभंग विट्ठल नाम के संकीर्तन से अंतःकरण की शुद्धि और परम शांति का मार्ग दर्शाता है। इस पावन भजन में माता सरस्वती के श्वेतवसना स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।