शारदा वीणावादिनी - करुणा अविरल धारा आराधना

संत सूरदास
माता सरस्वती भजन भजन माता सरस्वती
॥ दोहा ॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल hoy॥

॥ चौपाई ॥

श्वेत हंस पर बैठ विराजे, वीणा सुर झनकारे।
मूर्खहु पंडित बन जावे जब, दया दृष्टि विस्तारे॥
करुणा की अविरल सरिता माँ, शब्द ब्रह्म कल्याणी।
अंतर वीणा जागृत कीजे, वर दो हे कल्याणी॥

नाम जपे से पाप नशावे, जन्म मरण के फेर मिटावे।
संतन के संग मन रंग लीजै, जीवन सफल बनावे॥

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।
विद्या बुद्धि प्रदान करो माँ, अज्ञान तिमिर सब हरता॥

॥ दोहा ॥

सूरदास प्रभु तुम्हरे दरश बिन, नैनन चैन न पावे।
श्यामल सुंदर बाल रूप लखि, कोटि मदन शरमावे॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

महाकवि सूरदास जी का यह पद ब्रज रस और वात्सल्य भाव से परिपूर्ण है, जिसमें प्रभु के दिव्य रूप का साक्षात्कार कराया गया है। इस पावन भजन में माता सरस्वती के अज्ञान विनाशिनी स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।