संत तुलसीदास के नीति दोहे

गोस्वामी तुलसीदास
श्री राम संत साहित्य संत साहित्य तुलसीदास
॥ दोहा ॥

दया धरम का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्रान॥

तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।
बसीकरन इक मंत्र है, परिहरू बचन कठोर॥

॥ चौपाई ॥

१. तुलसी साथी बिपति के, बिद्या बिनय बिबेक।
साहस सुकृति सुसत्यब्रत, राम भरोसो एक॥
अर्थ: विपत्ति के समय मनुष्य के सच्चे साथी उसका ज्ञान, विनम्रता, विवेक, साहस, सत्कर्म, सत्यनिष्ठा और प्रभु श्री राम पर अटूट विश्वास हैं।

२. काम, क्रोध, मद, लोभ की, जौं लौं मन में खान।
तौ लौं पंडित मूरखौ, तुलसी एक समान॥
अर्थ: जब तक मनुष्य के मन में काम, क्रोध, अहंकार और लोभ का वास है, तब तक ज्ञानी और मूर्ख दोनों एक समान ही हैं।

३. जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।
अर्थ: जहाँ सद्बुद्धि और आपसी प्रेम है, वहाँ हर प्रकार की समृद्धि निवास करती है; और जहाँ दुर्बुद्धि है, वहाँ विपत्तियाँ ही विपत्तियाँ आती हैं।

४. परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।
अर्थ: परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं है, और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई नीच पाप नहीं है।

५. धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी, आपद काल परिखिअहिं चारी।
अर्थ: धैर्य, धर्म, सच्चा मित्र और जीवनसंगिनी—इन चारों की वास्तविक परीक्षा संकट के समय ही होती है।

॥ दोहा ॥

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय होके सोय।
अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

गोस्वामी तुलसीदास जी के नीतिपरक दोहे मर्यादा, धैर्य, परोपकार और प्रभु कृपा पर निर्भरता का अमूल्य पाठ पढ़ाते हैं।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।