त्रैलंग स्वामी

पारंपरिक
श्री राम संत साहित्य Bhakt Trailanga Swami Bhakt
॥ पावन पाठ ॥

भक्तिमालः त्रैलंग स्वामी

अन्य नाम - स्वामी गणपति सरस्वती

वास्तविक नाम - शिवराम

गुरु - भागीरथानन्द सरस्वती

आराध्य - भगवान शिव, माँ काली

जन्म - 29 दिसम्बर1607 (पौष शुक्ल एकादशी)

मृत्यु – 26 दिसम्बर 1887, वाराणसी (पौष शुक्ल एकादशी)

जन्म स्थान - विजयनगरम

वैवाहिक स्थिति - अविवाहित

भाषा - तेलुगु, हिंदी, संस्कृत, बंगाली

पिता - नरसिम्हा राव

माता - विद्यावती देवी

संस्थापक - दशनामी संप्रदाय

दर्शन - अद्वैत वेदांत, राज योग, तंत्र

श्री त्रैलंग स्वामी अपनी योगिक शक्तियों और दीर्घायु की कहानियों के साथ बहुत मशहूर हैं। कुछ खातों के अनुसार, त्रैलंग स्वामी 280 साल के थे जो 1737 और 1887 के बीच वाराणसी में रहते थे। उन्हें भक्तों द्वारा शिव का अवतार माना जाता है और एक हिंदू योगी, आध्यात्मिक शक्तियों के अधिकारी के साथ साथ बहुत रहस्यवादी भी माना जाता है।

वह बंगाल में बेहत मशुर ब्यक्ति हैं, श्री रामकृष्ण ने उन्हें "वाराणसी के चलते-फिरते शिव" के रूप में संदर्भित किया था। वो अपना समय संस्कृत श्लोकों को लिखने और दूसरों को सलाह देने में व्यतीत करते थे। ऐसा कहा जाता है कि वह बिना डूबे गंगा के पानी में लेट सकते थे, और बिना सांस लिए लंबे समय तक पानी के नीचे चले जाते थे। उनके दर्शन और शिक्षाओं को बाद में उनके शिष्य उमाचरण मुखोपाध्याय ने अपने लेखन में दर्ज किया था।

त्रैलंग स्वामी की जयंती पौष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि या पौष महीने में चंद्रमा के शुक्ल चरण के ग्यारहवें दिन मनाई जाती है।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

श्री त्रैलंग स्वामी अपनी योगिक शक्तियों और दीर्घायु की कहानियों के साथ बहुत मशहूर हैं। कुछ खातों के अनुसार, त्रैलंग स्वामी 280 साल के थे जो 1737 और 1887 के बीच वाराणसी में रहते थे। उन्हें भक्तों द्वारा शिव का अवतार माना जाता है और एक हिंदू योगी, आध्यात्मिक शक्तियों के अधिकारी के साथ साथ बहुत रहस्यवादी भी माना जाता है। Sri Trailanga Swami is very famous with stories of his yogic powers and longevity. According to some accounts, Trailanga Swami was 280 years old and lived in Varanasi between 1737 and 1887. He is considered by devotees to be an incarnation of Bhagwan Shiva and a Hindu yogi, possessor of spiritual powers as well as a great mystic.

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।