दत्तात्रेय प्रभु अवधूत - तीन बाण धारी प्रभु वंदना

संत कबीर
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॥ दोहा ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥

॥ चौपाई ॥

हारे के सहारे खाटू श्याम हमारे, लखदातार कन्हैया।
शीश के दानी शरण तुम्हारी, पार लगा दो नैया॥
फाल्गुन मेले भक्त पुकारे, निशान हाथ में सोहे।
तेरी कृपा से बिगड़े बनते, रूप अनुपम मोहे॥

ज्योति स्वरूप अखंड तुम्हारा, जग का पालनहार दुलारा।
अंधकार से मुक्ति दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥

बरसाने की लाडली श्री राधा, कृपा दृष्टि बरसाओ।
श्यामा प्यारी भानुदुलारी, हृदय कमल में आओ॥
चरण शरण की दासी बना लो, प्रेम सुधा रस दीजै।
राधा नाम रटे जो निसिदिन, भव बंधन हरि लीजै॥

॥ दोहा ॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, शब्द गहो चित लाय।
हरि सुमिरन बिन मुक्ति नाहीं, जनम अकारथ जाय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत कबीर का यह निर्गुण भजन बाह्य आडंबरों को त्यागकर अंतःकरण में सत्य, सत्संग और नाम सुमिरन की महिमा उजागर करता है। इस पावन भजन में अन्य के वरद वरदायक स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।