नीलवर्ण महाबली - तेल दीप प्रज्वलन भजन

पारंपरिक भजन
शनि देव भजन भजन शनि देव
॥ दोहा ॥

सुमिरन सार है नाम का, और सकल जंजाल।
आदि अंत सब देखिया, दूजा सब बेहाल॥

॥ चौपाई ॥

शनि देव की कृपा जो पावे, कष्ट कटे सब भारे।
सत्य न्याय की राह चलावे, भक्तन काज संवारे॥
तेल तिल उड़द दीप जलाकर, शीश झुकावत प्राणी।
दया दृष्टि कीजो हे स्वामी, सूर्यपुत्र कल्याणी॥

अमृत रस बरसे तेरे द्वारे, जो आए सो पार उतारे।
लाज राखि ले हे जगस्वामी, हम सब हैं तेरे सहारे॥

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
कौवे पर असवार विराजे, नील वसन तन धारे।
कर्म अनुसार फल देत विधाता, संकट दूर निवारे॥

॥ दोहा ॥

हरि ॐ तत्सत् नारायण, वासुदेव सुख रास।
जो यह पद निशदिन सुने, पूरे मन की आस॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

यह पारंपरिक भक्ति भजन प्राचीन संत परंपरा का पावन संकलन है, जो मन को एकाग्र कर ईश्वर के शरणागत होने की प्रेरणा देता है। इस पावन भजन में शनि देव के छायासुत स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।