श्री सूर्य चालीसा

पारंपरिक स्तुति
सूर्य देव चालीसा सूर्य चालीसा
॥ दोहा ॥

कनक बदन कुंडल मकर, मुकुट शीश पर हाय।
करुणा निधि दिनकर सदा, भक्तन की बलि जाय॥

॥ चौपाई ॥

जय सविता जय जय दिवाकर। सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु पतंग दिवाकर भास्कर। सविता हंस मार्तण्ड दिनकर॥

सप्त अश्वरथ गगन सिधारे। तिमिर समूह एक छिन में टारे॥
उदित भानु जब पूरब आवै। सकल जगत नव जीवन पावै॥

आरोग्य धन बुद्धि के दाता। तुम ही जग के जीवन त्राता॥
जो जन अर्घ्य चढ़ावै नित्य। ताहि न व्यापै रोग अनित्य॥

॥ दोहा ॥

सूर्य देव की जो करै, पूजा पाठ विधान।
तेज प्रताप आरोग्य लहि, पावै पद सम्मान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य की चालीसा साधक को तेज, आरोग्य, नेत्र ज्योति और दीर्घायु प्रदान करती है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।