॥ दोहा ॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो॥
॥ चौपाई ॥
चार पहर बंसीबट भटक्यो, सांझ परे घर आयो।
मैं बालक बहियन को छोटो, छींको किस विधि पायो॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो...
ग्वाल बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो।
तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो...
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो।
यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहि नाच नचायो॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो...
सूरदास तब बिहंसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो...
॥ दोहा ॥
बाल-कृष्ण की निष्कपट बाल-लीला निरखि, माता यशोदा सुध-बुध बिसराई।