श्री सुदर्शनाष्टकं

पारंपरिक
श्री कृष्ण मंत्र Mantra Shri Sudarshanashtakam Mantra
॥ पावन पाठ ॥

प्रतिभटश्रेणि भीषण वरगुणस्तोम भूषण जनिभयस्थान तारण जगदवस्थान कारण ।

निखिलदुष्कर्म कर्शन निगमसद्धर्म दर्शन जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥

शुभजगद्रूप मण्डन सुरगणत्रास खन्डन शतमखब्रह्म वन्दित शतपथब्रह्म नन्दित ।

प्रथितविद्वत् सपक्षित भजदहिर्बुध्न्य लक्षित जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥

स्फुटतटिज्जाल पिञ्जर पृथुतरज्वाल पञ्जर परिगत प्रत्नविग्रह पतुतरप्रज्ञ दुर्ग्रह ।

प्रहरण ग्राम मण्डित परिजन त्राण पण्डित जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥

निजपदप्रीत सद्गण निरुपधिस्फीत षड्गुण निगम निर्व्यूढ वैभव निजपर व्यूह वैभव ।

हरि हय द्वेषि दारण हर पुर प्लोष कारण जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥

दनुज विस्तार कर्तन जनि तमिस्रा विकर्तन दनुजविद्या निकर्तन भजदविद्या निवर्तन ।

अमर दृष्ट स्व विक्रम समर जुष्ट भ्रमिक्रम जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥

संतो की वाणी अष्टकम

प्रथिमुखालीढ बन्धुर पृथुमहाहेति दन्तुर विकटमाय बहिष्कृत विविधमाला परिष्कृत ।

स्थिरमहायन्त्र तन्त्रित दृढ दया तन्त्र यन्त्रित जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ।।

महित सम्पत् सदक्षर विहितसम्पत् षडक्षर षडरचक्र प्रतिष्ठित सकल तत्त्व प्रतिष्ठित ।

विविध सङ्कल्प कल्पक विबुधसङ्कल्प कल्पक जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥

भुवन नेत्र त्रयीमय सवन तेजस्त्रयीमय निरवधि स्वादु चिन्मय निखिल शक्ते जगन्मय ॥

अमित विश्वक्रियामय शमित विश्वग्भयामय जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥

फलश्रुति

द्विचतुष्कमिदं प्रभूतसारं पठतां वेङ्कटनायक प्रणीतम् ।

विषमेऽपि मनोरथः प्रधावन् न विहन्येत रथाङ्ग धुर्य गुप्तः ॥

॥इति श्री सुदर्शनाष्टकं समाप्तम् ॥

कवितार्किकसिंहाय कल्याणगुणशालिने ।

॥ दोहा ॥

॥ श्रीमते वेन्कटेषाय वेदान्तगुरवे नमः ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।