श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥
जय रघुपति राघौ राजा राम। पतित पावन सीताराम॥
दशरथ नंदन कौशल्या प्यारे। भक्त जनन के नैन तारे॥
लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न भाई। जानकी संग प्रभु छवि छाई॥
जनकपुरी में धनुष चढ़ाया। ताड़का मारि सुबाहु गिराया॥
मुनि विश्वामित्र के काज संवारे। अहिल्या उधारी असुर पछारे॥
तात वचन मानि वन को धाये। केवट की नाव चढ़ि पार सिधाये॥
चित्रकूट में कुटी बनाई। शबरी के जूठे फल खाई॥
सुग्रीवहिं मित्रता करवाई। बालि बधी सुग्रीव बड़ाई॥
पवनसुत पठयो लंका माहीं। सीता की सुधि लाए ताहीं॥
सिंधु लांघि प्रभु सेना लाई। रावण मारि लंका जितवाई॥
अयोध्या में जब राज विराजे। राम राज सुख त्रिभुवन छाजे॥
राम नाम जो जन जपै, भवसागर तरि जाय।
कहैं संत सब प्रेम से, जय रघुनंदन राय॥