स्वामी श्रद्धानन्द

गुरु नानक देव जी
श्री राम संत साहित्य Bhakt Swami Shraddhanand Bhakt
॥ पावन पाठ ॥

भक्तमालः स्वामी श्रद्धानन्द

वास्तविक नाम - बृहस्पति विज

अन्य नाम - लाला मुंशीराम विज, महात्मा मुंशीराम

गुरु - दयानंद सरस्वती

जन्म - 22 फ़रवरी 1856

जन्म स्थान - तलवान, जालंधर, पंजाब, भारत

निधन - 23 दिसम्बर 1926 (आयु 70 वर्ष)

वैवाहिक स्थिति: विवाहित

भाषा - उर्दू, हिंदी, संस्कृत, देवनागरी

पिता - लाला नानक चंद

पत्नी- शिवा देवी

प्रसिद्ध - आर्य समाज सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्रता सेनानी, स्वतंत्रता कार्यकर्ता, शिक्षक, धार्मिक नेता

स्वामी श्रद्धानंद देश के महान आर्य समाजी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद् और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका विशाल और प्रेरक व्यक्तित्व शाश्वत प्रेरणा का स्रोत था जिसने दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं का प्रचार किया। उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के आंदोलन को सही मायने में बढ़ावा दिया।

वर्ष 1917 में मुंशीराम 'श्रद्धानंद' नाम धारण करके 'संन्यासी' बन गए और गुरुकुल के बजाय दिल्ली को अपना स्थायी घर बना लिया। दिल्ली में, उन्होंने सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक सुधार और लोगों, विशेषकर तथाकथित 'अछूतों' के उत्थान के उद्देश्य से कई संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने दो प्रमुख समाचार पत्रों की भी स्थापना की: उर्दू 'तेज' और हिंदी 'अर्जुन'। वर्ष 1919 में स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय संघर्ष के दौरान वे गांधीजी के नेतृत्व में आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने लाखों पुरुषों और महिलाओं को ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।

उनका जीवन त्याग और तपस्या का प्रतीक था। उनका कार्यक्षेत्र असीमित था। भारत के डाक और तार विभाग ने एक महान आत्मा और निडर देशभक्त और भारत के महानतम पुत्रों में से एक, स्वामी श्रद्धानंद जी के सम्मान में 30 मार्च, 1970 को एक विशेष स्मारक टिकट जारी किया।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भक्तमालः स्वामी श्रद्धानन्द | Bhaktmal: Swami Shraddhanand

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।