नवदुर्गा कल्याणी - ज्योति स्वरूप माता आराधना

संत कबीर
माता दुर्गा भजन भजन माता दुर्गा
॥ दोहा ॥

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

॥ चौपाई ॥

दयामयी माँ कृपा कीजिये, दीन हीन संताने।
तेरे सिवा जग में कोई नाहिं, जो अंतर्मन जाने॥
जय जय दुर्गे मात भवानी, संकट हरणी माता।
चरणन में नित शीश नवाऊँ, हे सुख सम्पत्ति दाता॥

हरि के चरणन में सुख भारी, जहाँ बिराजे करुणा सारी।
भव के सागर तर जावेगा, सुमिरन कर ले बनवारी॥

लाल चुनरिया माँ के सोहे, दीप शिखा उजियारा।
जो ध्यावे सो फल पावे, मिटे कलेश अपारा॥
द्वार तिहारे जो नर आवे, झोली भर ले जावे।
कल्याणी जगदम्बा शेरावाली, सब सुख संपति पावे॥

॥ दोहा ॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, शब्द गहो चित लाय।
हरि सुमिरन बिन मुक्ति नाहीं, जनम अकारथ जाय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत कबीर का यह निर्गुण भजन बाह्य आडंबरों को त्यागकर अंतःकरण में सत्य, सत्संग और नाम सुमिरन की महिमा उजागर करता है। इस पावन भजन में माता दुर्गा के अभय प्रदायिनी स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।