शीश दान कर जो बने, जग के पालनहार।
उन खाटू के श्याम का, जय जय जय दरबार॥
शीश के दानी का दरबार सुहाना लगता है।
यहाँ आकर हर दुखियारा, दीवाना लगता है॥
शीश के दानी का दरबार सुहाना लगता है॥
फूलों से महक रहा है, सांवरिया का भवन।
दर्शन करके झूम उठे हैं, सबके तन और मन॥
इत्र की खुशबू उड़ती है, अजब नज़ारा लगता है।
शीश के दानी का दरबार सुहाना लगता है॥
सोने का सिंहासन चमके, सिर पर छत्र विराजे।
मोरछड़ी का झाड़ा लागे, नौबत बाजे गाजे॥
भक्तों का ये मेला बाबा, कितना प्यारा लगता है।
शीश के दानी का दरबार सुहाना लगता है॥
संजय मित्तल शीश झुकाए, तेरे पावन द्वारे।
कर दो बेड़ा पार प्रभु जी, हम सेवक हैं तुम्हारे॥
शीश के दानी का दरबार सुहाना लगता है॥
शीश दान की महिमा को, जाने सकल जहान।
खाटू वाले श्याम प्रभु, तुम हो दया निधान॥