जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥
श्वेत हंस पर बैठ विराजे, वीणा सुर झनकारे।
मूर्खहु पंडित बन जावे जब, दया दृष्टि विस्तारे॥
करुणा की अविरल सरिता माँ, शब्द ब्रह्म कल्याणी।
अंतर वीणा जागृत कीजे, वर दो हे कल्याणी॥
हरि के चरणन में सुख भारी, जहाँ बिराजे करुणा सारी।
भव के सागर तर जावेगा, सुमिरन कर ले बनवारी॥
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।
विद्या बुद्धि प्रदान करो माँ, अज्ञान तिमिर सब हरता॥
नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतरे पार।
जो सरधा कर सेवदे, तिन भवजल तारणहार॥