पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित hoy॥
श्वेत हंस पर बैठ विराजे, वीणा सुर झनकारे।
मूर्खहु पंडित बन जावे जब, दया दृष्टि विस्तारे॥
करुणा की अविरल सरिता माँ, शब्द ब्रह्म कल्याणी।
अंतर वीणा जागृत कीजे, वर दो हे कल्याणी॥
संत समागम परम सुहाई, जहाँ मिले अमृत की थाई।
काम क्रोध मद लोभ मिटावे, निर्मल ज्ञान समाई॥
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।
विद्या बुद्धि प्रदान करो माँ, अज्ञान तिमिर सब हरता॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो, शब्द गहो चित लाय।
हरि सुमिरन बिन मुक्ति नाहीं, जनम अकारथ जाय॥