॥ दोहा ॥
जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धारि।
बन्दौ मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
॥ चौपाई ॥
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
जय जय जय वीणाकर धारी। करत सदा सुहंस सवारी॥
श्वेत वस्त्र सोहत शुचि काया। सब मुनिजन तुम्हरी गुण गाया॥
विद्या बुद्धि विवेक विधाता। ज्ञान की देवी तुम सुखदाता॥
शारद मात कृपा करि दीजै। अज्ञानी को ज्ञानी कीजै॥
कवि कोविद सब तुमको ध्यावें। वेद पुराणन में जस पावें॥
जो जन सरस्वती चालीसा गावे। विद्या बुद्धि परम फल पावे॥
परीक्षा में सब बाधा जाई। मातु शारदा होय सहाई॥
॥ दोहा ॥
मातु भारती की कृपा, रहे सदा अनुकूल।
विद्या विनय विवेक से, खिले ज्ञान का फूल॥