सब कुछ नहीं है पैसा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

मकसद ऐ जिंदगी का क्यों रखलिया है पैसा

पैसे से सिकंदर ने क्या क्या खरीद लाया

आखरी घडी में पैसा ना काम आये

दो सांस भी मिल जाए होता नहीं है ऐसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

पैसा से कीमती तू बिस्तर खरीद लाया

लाया तू ठाठ तू घर में पर नींद क्यों गवाया

है नींद कीमती पर समझा नहीं तू ऐसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

एक हार की कमी थी बारात घर पे आयी

बेटी न बनी दुल्हन बरात लौट आयी

पैसे की है सगाई आया जमाना ऐसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

पैसा जो पास आया अभिमान लेके आया

उसको भी भूल बैठा जिसने तुझे बनाया

कुछ पा लिया तो कहता कोई न मेरे जैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

सब जानते हो एक दिन सब छोड़ के है जाना

तन भी ना साथ जाए छूटेगा ये खजाना

फिर किसलिए फड़ी तू करता है पैसा-पैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

है वो भी जरूरी पर सब कुछ नहीं है पैसा

मकसद ऐ जिंदगी का क्यों रखलिया है पैसा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।