॥ दोहा ॥
सांवरी मूरत मोहन की, मन मंदिर में साजे।
इंद्रेश बंशी की धुन पे, रोम रोम रस बाजे॥
॥ चौपाई ॥
सांवरे सलोने मेरे गिरधारी।
तेरी मंद मंद मुसकान पे मैं बलिहारी॥
सांवरे सलोने मेरे गिरधारी॥
मोर मुकुट पीतांबर सोहे।
बंशी की धुन त्रिभुवन मोहे॥
यमुना तट पे गौएं चरावे, बांके कुंजबिहारी।
सांवरे सलोने मेरे गिरधारी॥
तेरे नैनन में जादू भरियो।
चितचोर तूने मेरो मन हरिओ॥
तेरे दर की बन के दासी, खड़ी हूँ बनवारी।
सांवरे सलोने मेरे गिरधारी॥
इंद्रेश कहे ओ नंदनंदन।
करूँ मैं तेरा नित्य ही वंदन॥
अपने चरणों में स्थान दे, हे गोवर्धन धारी।
सांवरे सलोने मेरे गिरधारी॥
॥ दोहा ॥
गिरधारी गोपाल प्रभु, भक्तन के आधार।
इंद्रेश शरण में आ पड़ा, जय जय नन्दकुमार॥