॥ दोहा ॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...
प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भगति करै रैदासा॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...
॥ दोहा ॥
मन चंगा तो कठौती में गंगा।
संत रविदास की निर्मल वाणी॥