प्रभु जी तुम चंदन हम पानी (संत रविदास पद)

संत रविदास (रैदास)
अन्य संत साहित्य संत साहित्य रविदास
॥ दोहा ॥

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...

प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...

प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...

प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भगति करै रैदासा॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...

॥ दोहा ॥

मन चंगा तो कठौती में गंगा।
संत रविदास की निर्मल वाणी॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत शिरोमणि रविदास जी का यह पद भक्त और भगवान के बीच अभिन्न संबंध और परम अनन्य निष्काम भक्ति को प्रकट करता है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।