वीर बजरंगी - संजीवन बूटी धार भजन

अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना
हनुमान जी भजन भजन हनुमान जी
॥ दोहा ॥

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित hoy॥

॥ चौपाई ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
प्रभु के काज सँवारे सारे, भक्तन के रखवारे।
दीनबंधु दया करो अब, जय जय पवनकुमारे॥

संत समागम परम सुहाई, जहाँ मिले अमृत की थाई।
काम क्रोध मद लोभ मिटावे, निर्मल ज्ञान समाई॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवे, महावीर जब नाम सुनावै।
नाशै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।
सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥

॥ दोहा ॥

रहिमन विपदा हू भली, जो थोड़े दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

कविवर रहीम का यह नीति पद जीवन के व्यावहारिक सत्य, धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास की सीख देता है। इस पावन भजन में हनुमान जी के ज्ञान गुण सागर स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।